आधुनिकता की चाल में उलझनों का जाल है, अपनी तो खाना खराबी, गांवों में क्या हाल है ?

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आधुनिकता की चाल में उलझनों का जाल है,
अपनी तो खाना खराबी, गांवों में क्या हाल है ?
देख कर गांवों की हालत ग़मज़दा सी हो गई, 
खुशहाल थे जो गांवों मेरे हालत ये कैसी हो गई ?
लहलहाती फसलों की चादर चीथड़ों सी दिख रही,



महंगाई की मार में भी फसलें मंदी बिक रहीं,
अस्सी मिलें सब्ज़ियां, यहाँ दस की हैं, कमाल है,
अपनी तो खाना खराबी, गांवों में क्या हाल है !

सुविधा के अभाव में टिक रहा किसान है
इंटरनेट के दौर में भी अंगूठे का निशान है 
आमदनी होती नहीं सपने रह जाते धरे 
क़र्ज़ का है बोझ भारी क़र्ज़ वो कैसे भरे
मौसम की मार भी पड़ जाती हर साल है 
अपनी तो खाना खराबी गांवों में क्या हाल है ?

विद्यालय से शिक्षा को चार कोस तक चलना होगा 
पढ़ना है जो आगे तो कड़ी धूप में जलना होगा 
बेटी कैसे शिक्षित होगी जो इतनी मुश्किल राहें हैं 
पग पग पर जो दिखती रहती अत्याचारी बाहें हैं 
विद्यालय तक जाने का रास्ता खस्ताहाल है…..
अपनी तो खाना खराबी गांवों में क्या हाल है ?

धर्म जात के बंधन में सोच अभी तक छोटी है 
दहेज़ प्रथा में चलती रकम अभी तक मोटी है 
नौकरशाही फीताशाही पाव पसारे बैठी है 
यहाँ टूटे छप्पर के नीचे घनघोर गरीबी रहती है
निर्मल नीर बचा नहीं, सब गंदे पोखर, ताल हैं 
अपनी तो खाना खराबी गांवों में क्या हाल है ?
आधुनिकता की चाल में, उलझनों का जाल है
अपनी तो खाना खराबी, गांवों में क्या हाल है…?

                          *** मधु सुधा ***
                                          दिल्ली

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