गुजरा जमाना……

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गुजरा जमाना…….

पिया संग नाता जोड़ा था मैंने,
माँ बाप का घर छोड़ा था मैंने !
भाई बहन मेरे रोए बहुत थे,
कि सखियों के आंसू थमते नहीं थे !
वो शैतानियां, वो नादानियां,
सब हो चुकी हैं अब पहेलियां !



वो माँ कि शिकायत पर पापा का आँखें दिखाना,
फिर बाद में आके खुद ही मनाना,
वो गलती पर मेरी पापा के सामने झल्लाना,
फिर बाद में माँ का गले से लगाना !
वो भइया कि रोक टोक, वो बहना का प्यार,
ये सब हो चुका है अब गुजरा जमाना !
वो घूमना, वो फिरना, वो मौजे मनाना,
वो सखियों के संग हँसना खिलखिलाना,
वो भइया के संग गप्पे लड़ाना,
वो बहना के संग देर रात तक बतियाना,
वो पापा का फिर सुबह गुस्से से हमको उठाना,
ये सब बन गया है अब अफ़साना !
कैसे लाऊँ उन लम्हों को अपनी ओर मोड़कर,
जो कब के जा चुके हैं मुझे छोड़कर !
याद आती है बहुत रूलाती है बहुत,
वो मायके कि गुजरी हुई दास्तान,
वो हँसना खिलखिलाना, वो रूठना मनाना,
वो अठ्खेलियां, वो नादानियां,
वो बच्चों वाली शैतानियां,
ऐ जिंदगी तू ही बता….
क्या मुमकिन है उस गुजरे जमाने से
फिर मिल पाना ?

       *** नम्रता चौहान ***

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