मजबूरी ……………..

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………..मजबूरी ……….

कोई तो मजबूरी रही होगी शायद
आखिर क्यों रचनाकार ने मिटा दी
संसार की अनुपम रचना



आने वाले कल का अपना ही वजूद
आखिर उसी ने तो एक पहचान दी थी
ममता से परिपूर्ण स्नेहमयी मां का किरदार
जैसा निभाया उसकी जननी ने उसके जन्म पर
वो क्यों नहीं निभा पाई
कुछ तो मजबूरी रही होगी शायद?

जिसकी रचना अनन्त युगों से
करती आई है मां की कोख
स्वयं के लहू, अस्थि सांसों से
नवमाष के तप के बल से
फिर क्यों अपनी कृति को
छोड़ दिया कुकुर नरभक्षी हेतु
कुछ तो मजबूरी रही होगी शायद?

ह्रदयविदारक चीख क्यों घुट गई
प्रसववेदना को विस्मृत कर
एक मोहक हंसी को दिया जिसने
उसके दर्द से भरे मुख पर
छाती में भर आया जो अमृत
कैसे उसके वेग को रोका होगा
चेहरा तनिक निहार लूं गुड़िया का
उसके दिल ने एक बार तो कहा होगा
क्यों थैली में लपेट नाली में छोड़ दिया
कुछ तो मजबूरी रही होगी शायद?

छोड़ कर जाते उसका दिल भी रोया है
तभी तो खड़ी है वहीं एक दीवार के सहारे
मन तो करता है अभी गोद में उठा के चूम लूं
लेकिन एक डर उसे खाये जा रहा है
वो भूल क्यों गई पगली
उस डर को भी जन्मा है उसी ने
जो जिंदगी देती है प्रकृति को
एक नया जीव देकर
तो वो क्यों नहीं दे रही जीवन उसको
कोई तो मजबूरी रही होगी शायद?

उसका अंश तड़प रहा है
आखिरी सांसें गिन रहा है
ढूंढ रही हैं उसकी धड़कनें
अपनी मां के स्पंदन को
दूध की जगह जहरीला पानी
उसके अबोल अधर पी रहे
आँखों के सामने मरते देख कर मौन है
कोई तो मजबूरी रही होगी शायद?

आज एक पैर आगे बढ़ा पाती
उसे स्नेह से छाती लगा पाती
कर्ज उसका भी चुक जाता
मिला था जो मां से उसे
थकी हारी वापस लौट आई
खुद को लेकर अपना सब खोकर
कुछ तो मजबूरी रही होगी शायद?

रचनाकार : ✍कुलदीप श्याम सुन्दर ‘मस्ताना’

(प्रस्तुति : अनीता गुलेरिया, दिल्ली)

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