भाई – बहन के पवित्र रिश्ते की डोर को मजबूत करता है रक्षा बंधन

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त्योहार के पीछे जुड़ी है देवताओं की दास्तान

डॉ.एन.के.मौर्य
वजीरगंज – गोण्डा। भाई बहन के आस्था का प्रतीक रक्षा बंधन का पवित्र पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस त्योहार के पीछे देवताओं की दास्तान छिपी है, जिसे देखते हुए आगे चलकर यह त्योहार भाई बहन के अटूट प्रेम बंधन में बंध गया और हिन्दू धर्म मे यह त्योहार भाई बहन के प्रति समर्पित हो गया।



     शास्त्रों के अनुसार इस त्योहार के पीछे कई  दास्तान छिपे हैं जिनमे से एक दास्तान भगवान् श्री कृष्ण की है। कहा जाता है कि एक बार कृष्ण के हाथ मे चोट लग गयी और खून बहने लगा। द्रोपदी ने देखा तो उसने साड़ी का किनारा फाड़ कर भाई कृष्ण के हाथ में बाँध दिया। इस बंधन के ऋण को चुकाने के लिए कृष्ण ने उस वक़्त द्रोपदी की लाज बचाई जब दुष्ट दुशासन द्रोपदी का चीर हरण कर रहा था। इसी घटना से प्रभावित होकर बहनो ने भाई के हाथ मे चीर बांधना शुरू कर दिया जो आगे चलकर रक्षा बंधन कहलाया। दूसरी प्रचलित दास्तान गणेश भगवान से जुड़ी है। कहा जाता है कि गणेश के दो पुत्रों द्वारा बहन के लिए जिद्द करने पर गणेश ने संतोषी नाम की एक मायावी पुत्री उत्पन्न किया, जिसे देख दोनो भाई अति प्रसन्न हुए, तत्पश्चात संतोषी ने दोनों को राखी बांधी।

 हुमायूं बादशाह ने भी महारानी कर्मवती से बंधवाई थी राखी

         बताया जाता है कि महारानी कर्मवती हर वर्ष हुमायूँ को राखी बांधती थी। गुजरात के बादशाह बहादुर शाह ने जब चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण करने की खबर भेजवाई तो भारी संकट मंडराता देख महारानी कर्मवती ने अपनी रक्षा हेतु हुमायूँ को राखी भेजवाई। मुस्लिम शासक हुमायूँ ने बहन की रक्षा हेतु चित्तौड़गढ़ की ओर रवानगी की मगर उसके पहुँचने से पहले ही कर्मवती मर चुकी थी, जिसके चिता की राख को साक्षी मानकर उसने बदला लेने का सौगंध लिया। तभी से इस त्योहार का महत्व और भी बढ़ गया। और इस दिन बहने दूर दराज जाकर अपने भाई  को राखी बांधती हैं।

इन्द्र देवता ने भी इन्द्राणी से बंधवाया था रक्षा का सूत्र

     युद्धिष्ठिर ने जब भगवान श्री कृष्ण से पूछा कि हमे रक्षा बंधन की वो कहानी सुनाएं जिससे इंसान का दुःख दूर होता है। इस पर कृष्ण ने कहा कि एक बार देवों और असुरों में युद्ध छिड़ गया जो 12 वर्ष तक जारी रहा। इस युद्ध में इंद्र पराजय हुए, असुरों के राज ने देवताओं की सम्पति पर अपना अधिकार जमा लिया। इस दौरान जान बचाकर भागे इंद्र ने देवताओं के साथ अमरावती पर्वत पर  अपना डेरा डाल लिया। इंद्र बदले की आग में जल रहे थे कि इसी बीच गुरु बृहस्पति ने उन्हें रक्षा विधान करने को कहा। तत्पश्चात श्रावण पूर्णिमा के प्रातः काल ही इन्द्राणी ने ब्राह्मण पुरोहितों के द्वारा मंत्रो उच्चार कराके इंद्र के दाहने हाथ में रक्षा का सूत्र बाँध दिया। बाद में जब इंद्र ने असुरों से युद्ध किया तो विजय की प्राप्ति हुई। जिससे प्रभावित होकर बहनो ने भी अपने भाइयों को राखी बांधना शुरु कर दिया जो आगे चलकर रक्षा बंधन के पवित्र पर्व में तब्दील हो गया।

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