नारी की कश्मकश……

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नारी की कश्मकश
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मेरा कोई
अस्तित्व नहीं।
मैं चाहती भी नहीं
मेरा हो अस्तित्व।



मेरी फ्रेमिंग देती है
पूरे घर को अस्तित्व।
जिस दिन करुँगी
अपने घर से
बग़ावत
ढूँढूंगी अपना अस्तित्व।
शायद पा भी लूँ
किन्तु, खुद की नज़रों में
हो जाऊँगी अस्तित्वहीन।
नहीं बराबरी करना
मुझे पुरुषों से…  
शिल्पकार की
मूर्ति से क्या बराबरी।
बुनियाद की ईंटें
हार जाती हैं अक्सर
अपने घर की
मजबूती के लिए।
बुर्ज की खूबसूरती
के लिए।
मेरे जीते जी
दफ़्न होती साँसों ने
बुर्ज को ज़िंदगी
और खूबसूरती बख्शी है।
मैं पूरी इमारत
के लिए
होती रहूंगी दफ़्न।
नहीं चाहिए
मुझे अपने घर का
बिखरा अस्तित्व…
मैं “अस्तित्वहीन” ही सही।

*** तनु युग भारद्वाज ***
           ( दिल्ली )

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